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mahabharat 3.207.91-93h: इस प्रकार आचरण करने वाले संत अनंत काल तक उन्नति की ओर अग्रसर रहते हैं। जो संत बुद्धिमान, धैर्यवान, दयालु, राग-द्वेष से रहित, अहिंसा, सत्य, मृदुता, सरलता, विद्रोह, अहंकार का त्याग, लज्जा, क्षमा, लज्जा, साहस आदि गुणों से युक्त होते हैं, वे समस्त संसार के लिए प्रमाण हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 91-93h
 
 
श्लोक  3.207.91-93h 
एवं सन्तो वर्तमानास्त्वेधन्ते शाश्वती: समा:।
अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यमथार्जवम्॥ ९१॥
अद्रोहो नाभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दम: शम:।
धीमन्तो धृतिमन्तश्च भूतानामनुकम्पका:॥ ९२॥
अकामद्वेषसंयुक्तास्ते सन्तो लोकसाक्षिण:।
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आचरण करने वाले संत अनंत काल तक उन्नति की ओर अग्रसर रहते हैं। जो संत बुद्धिमान, धैर्यवान, दयालु, राग-द्वेष से रहित, अहिंसा, सत्य, मृदुता, सरलता, विद्रोह, अहंकार का त्याग, लज्जा, क्षमा, लज्जा, साहस आदि गुणों से युक्त होते हैं, वे समस्त संसार के लिए प्रमाण हैं।
 
Saints who behave like this continue to move towards progress till eternity. Those saints who are intelligent, patient, kind and free from attachment and hatred, possessing the qualities of non-violence, truthfulness, softness, simplicity, rebellion, renunciation of ego, shyness, forgiveness, shyness, courage, are a proof for the entire world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)