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mahabharat 3.207.87-88: जो सबको दान देते हैं, अपने कुटुम्बियों में सब कुछ बराबर बाँट देते हैं, समान रूप से उपभोग करते हैं, दीन-दुखियों पर दया करते हैं, शास्त्रों के ज्ञान से युक्त हैं, सबका आदर करते हैं, तपस्वी हैं और सब जीवों पर दया करते हैं, वे ही महापुरुषों द्वारा पूज्य कहे गए हैं ॥87-88॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 87-88
 
 
श्लोक  3.207.87-88 
दातार: संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिण:॥ ८७॥
सर्वपूज्या: श्रुतधनास्तथैव च तपस्विन:।
सर्वभूतदयावन्तस्ते शिष्टा: शिष्टसम्मता:॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
जो सबको दान देते हैं, अपने कुटुम्बियों में सब कुछ बराबर बाँट देते हैं, समान रूप से उपभोग करते हैं, दीन-दुखियों पर दया करते हैं, शास्त्रों के ज्ञान से युक्त हैं, सबका आदर करते हैं, तपस्वी हैं और सब जीवों पर दया करते हैं, वे ही महापुरुषों द्वारा पूज्य कहे गए हैं ॥87-88॥
 
Those who give alms to all, distribute everything equally among their family members, use it equally, show kindness to the poor, are rich in knowledge of scriptures, are respectful to all, are ascetic and are kind to all living beings, they have been called chivalrous, respected by great men. 87-88॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)