Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.207.76: जीव का जो स्वभाव है, वह अपने स्वभाव का ही अनुसरण करता है। जो पापी मनुष्य अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वही काम, क्रोध आदि विकारों को प्राप्त होता है ॥ 76॥ | mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यो यथाप्रकृतिर्जन्तु: स स्वां प्रकृतिमश्नुते।
पापात्मा क्रोधकामादीन् दोषानाप्नोत्यनात्मवान्॥ ७६॥
अनुवाद
जीव का जो स्वभाव है, वह अपने स्वभाव का ही अनुसरण करता है। जो पापी मनुष्य अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वही काम, क्रोध आदि विकारों को प्राप्त होता है ॥ 76॥
Whatever is the nature of a living being, it follows its own nature. Only a sinful person who cannot control his mind gets the vices like lust, anger etc. ॥ 76॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥