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mahabharat 3.207.73: जैसे श्वेत वस्त्र पर कोई भी रंग अच्छा लगता है, वैसे ही बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे संचित किया गया महान धर्म, शिष्टाचार का पालन करने वाले पुरुष पर ही अच्छी तरह चमकता है ॥ 73॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  3.207.73 
क्रमेण संचितो धर्मो बुद्धियोगमयो महान्।
शिष्टाचारे भवेत् साधू राग: शुक्लेव वाससि॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
जैसे श्वेत वस्त्र पर कोई भी रंग अच्छा लगता है, वैसे ही बुद्धि द्वारा धीरे-धीरे संचित किया गया महान धर्म, शिष्टाचार का पालन करने वाले पुरुष पर ही अच्छी तरह चमकता है ॥ 73॥
 
Just as any colour looks best on a white cloth, so too the great Dharma, gradually accumulated through wisdom, shines well only in a man who follows etiquette. ॥ 73॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)