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mahabharat 3.207.69: जो लोग सदाचारी हैं, वे सदैव अनुशासित जीवन जीते हैं, वेदों के अध्ययन में तत्पर रहते हैं और त्यागी हैं। वे धर्म के मार्ग पर चलते हैं और सच्चे धर्म को ही अपना परम आश्रय मानते हैं ॥69॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  3.207.69 
ये तु शिष्टा: सुनियता: श्रुतित्यागपरायणा:।
धर्मपन्थानमारूढा: सत्यधर्मपरायणा:॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
जो लोग सदाचारी हैं, वे सदैव अनुशासित जीवन जीते हैं, वेदों के अध्ययन में तत्पर रहते हैं और त्यागी हैं। वे धर्म के मार्ग पर चलते हैं और सच्चे धर्म को ही अपना परम आश्रय मानते हैं ॥69॥
 
Those who are well behaved always lead a disciplined life, are devoted to the study of the Vedas and are renunciants. They follow the path of Dharma and consider the true Dharma as their ultimate refuge. ॥ 69॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)