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mahabharat 3.207.68: जो मनुष्य बुद्धि से मोहित होकर धर्म में दोष देखते हैं, वे स्वयं तो भटकते ही हैं, उनका अनुसरण करने वाले भी दुःख भोगते हैं ॥ 68॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  3.207.68 
ये तु धर्मानसूयन्ते बुद्धिमोहान्विता नरा:।
अपथा गच्छतां तेषामनुयाता च पीडॺते॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य बुद्धि से मोहित होकर धर्म में दोष देखते हैं, वे स्वयं तो भटकते ही हैं, उनका अनुसरण करने वाले भी दुःख भोगते हैं ॥ 68॥
 
Those men who, being deluded by their intellect, find faults in religion, not only go astray themselves, but those who follow them also suffer. ॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)