Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.207.65: हे ब्रह्मन्! गुरु की सेवा, सत्य भाषण, क्रोध का अभाव और दान- ये चार गुण सदाचारी पुरुषों में रहते हैं ॥65॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.207.65 
गुरुशुश्रूषणं सत्यमक्रोधो दानमेव च।
एतच्चतुष्टयं ब्रह्मन् शिष्टाचारेषु नित्यदा॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! गुरु की सेवा, सत्य भाषण, क्रोध का अभाव और दान- ये चार गुण सदाचारी पुरुषों में रहते हैं ॥65॥
 
Brahman! Service to the Guru, truthful speech, absence of anger and charity – these four virtues always remain in well-mannered men. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)