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mahabharat 3.207.64: वे निरन्तर त्याग और स्वाध्याय में लगे रहते हैं। वे किसी प्रकार की मनमानी नहीं करते। सदाचार का पालन करना सभ्य पुरुषों का एक और लक्षण है।   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  3.207.64 
न तेषां विद्यतेऽवृत्तं यज्ञस्वाध्यायशीलिनाम्।
आचारपालनं चैव द्वितीयं शिष्टलक्षणम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
वे निरन्तर त्याग और स्वाध्याय में लगे रहते हैं। वे किसी प्रकार की मनमानी नहीं करते। सदाचार का पालन करना सभ्य पुरुषों का एक और लक्षण है।
 
They are constantly engaged in sacrifices and self-study. They do not show any arbitrariness. Following good conduct is another characteristic of civilized men. 64.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)