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mahabharat 3.207.60: मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! तत्पश्चात् परम बुद्धिमान कौशिक ने धर्मव्याध से पूछा - 'पुरुषश्रेष्ठ ! मैं शिष्टाचार कैसे जानूँ ?' 60॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  3.207.60 
मार्कण्डेय उवाच
स तु विप्रो महाप्राज्ञो धर्मव्याधमपृच्छत।
शिष्टाचारं कथमहं विद्यामिति नरोत्तम॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! तत्पश्चात् परम बुद्धिमान कौशिक ने धर्मव्याध से पूछा - 'पुरुषश्रेष्ठ ! मैं शिष्टाचार कैसे जानूँ ?' 60॥
 
Markandeyaji says – Yudhishthir! Thereafter, the most intelligent Kaushik asked Dharmavyadha – 'Best of men! How do I know etiquette? 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)