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mahabharat 3.207.58: हे ब्राह्मण! लोभ को ही सब पापों का मूल समझो। जिन लोभियों ने अधिकांश शास्त्रों का श्रवण नहीं किया है, वे पाप करने का विचार करते हैं।॥58॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.207.58 
पापानां विद्धॺधिष्ठानं लोभमेव द्विजोत्तम।
लुब्धा: पापं व्यवस्यन्ति नरा नातिबहुश्रुता:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! लोभ को ही सब पापों का मूल समझो। जिन लोभियों ने अधिकांश शास्त्रों का श्रवण नहीं किया है, वे पाप करने का विचार करते हैं।॥58॥
 
O Brahmin! Consider greed to be the root of all sins. Greedy people who have not listened to most of the scriptures think of committing sins. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)