Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.207.57: जैसे उदित होते हुए सूर्य अस्त हुए अंधकार को नष्ट कर देते हैं, वैसे ही जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के कल्याण के लिए शुभ कर्म करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 57॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.207.57 
यथाऽऽदित्य: समुद्यन् वै तम: पूर्वं व्यपोहति।
एवं कल्याणमातिष्ठन् सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जैसे उदित होते हुए सूर्य अस्त हुए अंधकार को नष्ट कर देते हैं, वैसे ही जो मनुष्य बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के कल्याण के लिए शुभ कर्म करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 57॥
 
Just as the rising Sun destroys the darkness that had set in, similarly a person who performs auspicious deeds for the welfare of others without any selfish motive gets rid of all sins. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)