Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.207.53: यदि पहले से पुण्य करने वाला मनुष्य यहाँ अनजाने में भी पाप कर बैठता है, तो भी वह बाद में (निष्काम भाव से पुण्य कर्म करके) उस पाप को नष्ट कर देता है। हे राजन! यहाँ प्रमाद से किए हुए पापों को मनुष्यों का धर्म ही नष्ट कर देता है ॥ 53॥ | mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यदि पहले से पुण्य करने वाला मनुष्य यहाँ अनजाने में भी पाप कर बैठता है, तो भी वह बाद में (निष्काम भाव से पुण्य कर्म करके) उस पाप को नष्ट कर देता है। हे राजन! यहाँ प्रमाद से किए हुए पापों को मनुष्यों का धर्म ही नष्ट कर देता है ॥ 53॥
Even if a previously virtuous person unknowingly commits a sin here, he later destroys that sin (by doing virtuous deeds without any desire). O King, the dharma of human beings itself removes the sins committed here due to negligence. ॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥