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mahabharat 3.207.51: जो मनुष्य पाप करके पूरे मन से पश्चाताप करता है, वह उस पाप से मुक्त हो जाता है और यदि वह यह दृढ़ निश्चय कर ले कि वह ऐसा कार्य फिर कभी नहीं करेगा, तो वह भविष्य में कोई भी पाप करने से बच जाता है ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.207.51 
विकर्मणा तप्यमान: पापाद् विपरिमुच्यते।
न तत् कुर्यां पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य पाप करके पूरे मन से पश्चाताप करता है, वह उस पाप से मुक्त हो जाता है और यदि वह यह दृढ़ निश्चय कर ले कि वह ऐसा कार्य फिर कभी नहीं करेगा, तो वह भविष्य में कोई भी पाप करने से बच जाता है ॥ 51॥
 
A person who repents with all his heart after committing a sin is freed from that sin. And if he makes a firm resolve that he will never commit such an act again, he is saved from committing any other sin in the future. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)