Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.207.44: यदि भूल से कोई निन्दित कर्म हो जाए, तो उस कर्म को दोबारा न करो। मन और बुद्धि से विचार करके जो कर्म हितकर जान पड़े, उसमें लग जाओ। ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.207.44 
कर्म चेत्किंचिदन्यत् स्यादितरन्न तदाचरेत्।
यत् कल्याणमभिध्यायेत् तत्रात्मानं नियोजयेत्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
यदि भूल से कोई निन्दित कर्म हो जाए, तो उस कर्म को दोबारा न करो। मन और बुद्धि से विचार करके जो कर्म हितकर जान पड़े, उसमें लग जाओ। ॥44॥
 
If by mistake you commit any condemned act, then do not do that act again. After thinking with your mind and intellect, engage yourself in that act which seems to be beneficial. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)