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mahabharat 3.207.4-5h: मन में ऐसा निश्चय करके वे कौतूहलवश मिथिलापुरी की ओर चल पड़े। उनकी पतिव्रता पत्नी ने स्वयं बगुले वाली घटना को जान लिया था और उन्हें धर्मानुसार शुभ वचनों से उपदेश दिया था। इन कारणों से कौशिक को उनके वचनों पर अटूट विश्वास था।   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 4-5h
 
 
श्लोक  3.207.4-5h 
इति संचित्य मनसा श्रद्दधान: स्त्रिया वच:।
बलाकाप्रत्ययेनासौ धर्म्यैश्च वचनै: शुभै:॥ ४॥
सम्प्रतस्थे स मिथिलां कौतूहलसमन्वित:।
 
 
अनुवाद
मन में ऐसा निश्चय करके वे कौतूहलवश मिथिलापुरी की ओर चल पड़े। उनकी पतिव्रता पत्नी ने स्वयं बगुले वाली घटना को जान लिया था और उन्हें धर्मानुसार शुभ वचनों से उपदेश दिया था। इन कारणों से कौशिक को उनके वचनों पर अटूट विश्वास था।
 
Having made this decision in his mind, he set out towards Mithilapuri out of curiosity. The devoted wife had herself come to know about the incident involving the heron and had preached him with auspicious words in accordance with the Dharma. Due to these reasons, Kaushik had great faith in her words. 4 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)