Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.207.39-40h: जो राजा धर्म का पालन करते हुए जीवन जीते हैं, धर्म में तत्पर रहते हैं, दूसरों की संपत्ति का उपभोग नहीं करते तथा सदैव अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे ही उन्नति करते हैं। | mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
ये जीवन्ति स्वधर्मेण संयुञ्जन्ति च पार्थिवा:॥ ३९॥
न किंचिदुपजीवन्ति दान्ता उत्थानशीलिन:।
अनुवाद
जो राजा धर्म का पालन करते हुए जीवन जीते हैं, धर्म में तत्पर रहते हैं, दूसरों की संपत्ति का उपभोग नहीं करते तथा सदैव अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे ही उन्नति करते हैं।
Those kings who live their lives by following their Dharma, remain devoted to Dharma, do not use any property belonging to others and always exercise control over their senses, they alone prosper. 39 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥