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mahabharat 3.207.37: जब राजा अधर्मी होते हैं, तो उनकी प्रजा सदैव पतन को प्राप्त होती है। हमारे राजा जनक अपनी समस्त प्रजा को धर्म की दृष्टि से देखते हैं ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.207.37 
पार्थिवानामधर्मत्वात् प्रजानामभव: सदा।
स एष राजा जनक: प्रजा धर्मेण पश्यति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जब राजा अधर्मी होते हैं, तो उनकी प्रजा सदैव पतन को प्राप्त होती है। हमारे राजा जनक अपनी समस्त प्रजा को धर्म की दृष्टि से देखते हैं ॥37॥
 
When kings are unrighteous, their subjects always fall. Our king Janak looks at all his subjects from a righteous point of view. ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)