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mahabharat 3.207.35: राजाओं के व्यभिचार के कारण धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म की वृद्धि होती है। इससे प्रजा में वर्ण-भेद बढ़ जाता है ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.207.35 
व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्म: संकीर्यते महान्।
अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते तत: प्रजा:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
राजाओं के व्यभिचार के कारण धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म की वृद्धि होती है। इससे प्रजा में वर्ण-भेद बढ़ जाता है ॥35॥
 
Due to the adultery of kings, Dharma (righteousness) becomes very narrow and Adharma (irreligion) increases. This leads to the mixing of castes among the people. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)