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mahabharat 3.207.34: चरित्रहीन मनुष्य कभी-कभी गुणवान हो जाता है। पशु-हिंसा करने वाला मनुष्य भी पुनः गुणवान हो जाता है ॥34॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.207.34 
अशीलश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान्।
प्राणिहिंसारतश्चापि भवते धार्मिक: पुन:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
चरित्रहीन मनुष्य कभी-कभी गुणवान हो जाता है। पशु-हिंसा करने वाला मनुष्य भी पुनः गुणवान हो जाता है ॥34॥
 
A man devoid of moral character sometimes becomes virtuous. A man who indulges in violence against animals also becomes virtuous again. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)