Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.207.28: हे ब्रह्मर्षि! यह राजा जनक की नगरी है, यहाँ वर्ण-धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाला कोई नहीं है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यहाँ चारों वर्णों के लोग अपने-अपने कर्म करते हैं॥ 28॥ | mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जनकस्येह विप्रर्षे विकर्मस्थो न विद्यते।
स्वकर्मनिरता वर्णाश्चत्वारोऽपि द्विजोत्तम॥ २८॥
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! यह राजा जनक की नगरी है, यहाँ वर्ण-धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाला कोई नहीं है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यहाँ चारों वर्णों के लोग अपने-अपने कर्म करते हैं॥ 28॥
O Brahmarshi! This is the city of King Janaka, there is no one here who behaves against the Varna-Dharma. O best of the Brahmins! Here people of all the four Varnas perform their respective duties.॥ 28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥