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mahabharat 3.207.27: इसलिए राजाओं से सदैव डरना चाहिए क्योंकि वे प्रजा के स्वामी हैं। राजा धर्म के विरुद्ध कार्य करने वालों को दण्ड देते हैं और उन्हें पाप करने से उसी प्रकार रोकते हैं जैसे वे हिंसक पशुओं को बाणों से हिंसा करने से रोकते हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.207.27 
भेतव्यं हि सदा राज्ञ: प्रजानामधिपा हि ते।
वारयन्ति विकर्मस्थं नृपा मृगमिवेषुभि:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इसलिए राजाओं से सदैव डरना चाहिए क्योंकि वे प्रजा के स्वामी हैं। राजा धर्म के विरुद्ध कार्य करने वालों को दण्ड देते हैं और उन्हें पाप करने से उसी प्रकार रोकते हैं जैसे वे हिंसक पशुओं को बाणों से हिंसा करने से रोकते हैं।
 
Therefore, one should always fear kings because they are the masters of the people. Kings punish those who do things contrary to Dharma and stop them from committing sins in the same way as they stop violent animals from committing violence with arrows.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)