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mahabharat 3.207.26: राजा अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन करता है, जो अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार उचित कर्मों में संलग्न रहती है; और जो अपने कर्तव्य से च्युत होकर विपरीत दिशा में जा रहे हैं, उन्हें वह पुनः अपने कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करता है ॥26॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.207.26 
राजा प्रशास्ति धर्मेण स्वकर्मनिरता: प्रजा:।
विकर्माणश्च ये केचित् तान् युनक्ति स्वकर्मसु॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजा अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन करता है, जो अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार उचित कर्मों में संलग्न रहती है; और जो अपने कर्तव्य से च्युत होकर विपरीत दिशा में जा रहे हैं, उन्हें वह पुनः अपने कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करता है ॥26॥
 
The king rules righteously over his subjects who are engaged in the duties appropriate to their respective varnas and asrams, and he makes those who have fallen from their duties and are going in the opposite direction, to perform their duties again. ॥26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)