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mahabharat 3.207.22: मैं सत्य बोलता हूँ। किसी की निन्दा नहीं करता और यथाशक्ति दान भी देता हूँ। देवताओं, अतिथियों, कुटुम्बियों और पालन-पोषण के योग्य सेवकों को भोजन कराकर जो कुछ बचता है, उसी से अपने शरीर का पालन करता हूँ॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.207.22 
सत्यं वदे नाभ्यसूये यथाशक्ति ददामि च।
देवतातिथिभृत्यानामवशिष्टेन वर्तये॥ २२॥
 
 
अनुवाद
मैं सत्य बोलता हूँ। किसी की निन्दा नहीं करता और यथाशक्ति दान भी देता हूँ। देवताओं, अतिथियों, कुटुम्बियों और पालन-पोषण के योग्य सेवकों को भोजन कराकर जो कुछ बचता है, उसी से अपने शरीर का पालन करता हूँ॥ 22॥
 
I speak the truth. I do not criticise anyone and I also give charity according to my capacity. After giving food to the gods, guests, family members and servants who deserve to be sustained, I sustain my body with whatever is left.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)