Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.207.2: फिर उन्होंने अपने धर्म की सूक्ष्म क्रियाविधि पर विचार करते हुए मन ही मन कहा - 'मुझे (उस सती के वचनों पर) श्रद्धा और विश्वास करना ही होगा; अतः मैं अवश्य ही मिथिला को जाऊँगा।॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.207.2 
चिन्तयान: स्वधर्मस्य सूक्ष्मां गतिमथाब्रवीत्।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं गच्छामि मिथिलामहम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
फिर उन्होंने अपने धर्म की सूक्ष्म क्रियाविधि पर विचार करते हुए मन ही मन कहा - 'मुझे (उस सती के वचनों पर) श्रद्धा और विश्वास करना ही होगा; अतः मैं अवश्य ही मिथिला को जाऊँगा।॥ 2॥
 
Then, contemplating the subtle workings of his religion, he said to himself, 'I must have faith and believe in (the words of that Sati); therefore, I shall certainly go to Mithila.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)