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mahabharat 3.207.10-11: वहाँ उन्होंने लोगों से धर्मव्याध का पता पूछा और ब्राह्मणों ने उन्हें उसका स्थान बता दिया। कौशिक ने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखाने में बैठकर सूअर, भैंस आदि पशुओं का मांस बेच रहे हैं। वहाँ ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी, अतः कौशिक एकान्त में जाकर खड़े हो गए॥10-11॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  3.207.10-11 
धर्मव्याधमपृच्छच्च स चास्य कथितो द्विजै:।
अपश्यत् तत्र गत्वा तं सूनामध्ये व्यवस्थितम्॥ १०॥
मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम्।
आकुलत्वाच्च क्रेतॄणामेकान्ते संस्थितो द्विज:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उन्होंने लोगों से धर्मव्याध का पता पूछा और ब्राह्मणों ने उन्हें उसका स्थान बता दिया। कौशिक ने वहाँ जाकर देखा कि तपस्वी धर्मव्याध कसाईखाने में बैठकर सूअर, भैंस आदि पशुओं का मांस बेच रहे हैं। वहाँ ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी, अतः कौशिक एकान्त में जाकर खड़े हो गए॥10-11॥
 
There he asked people for the address of Dharmavyadh and the Brahmins told him his location. Kaushik went there and saw that the ascetic Dharmavyadh was sitting in the slaughterhouse selling the meat of animals like pigs, buffaloes etc. There was a crowd of customers there, so Kaushik went and stood in solitude.॥10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)