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mahabharat 3.207.1: मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस पतिव्रता पत्नी की कही हुई सब बातें सोचकर ब्राह्मण कौशिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने को कोसने लगा और अपने को अपराधी सा अनुभव करने लगा॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.207.1 
मार्कण्डेय उवाच
चिन्तयित्वा तदाश्चर्यं स्त्रिया प्रोक्तमशेषत:।
विनिन्दन् स स्वमात्मानमागस्कृत इवाबभौ॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस पतिव्रता पत्नी की कही हुई सब बातें सोचकर ब्राह्मण कौशिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अपने को कोसने लगा और अपने को अपराधी सा अनुभव करने लगा॥1॥
 
Markandeya says - Yudhishthira! After thinking about all the things said by that devoted wife, Brahmin Kaushik was very surprised. He started cursing himself and felt like a criminal.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)