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mahabharat 3.206.7-8: मार्कण्डेय कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार-बार पश्चाताप करके वह विद्वान ब्राह्मण भिक्षा मांगने के लिए गाँव में गया। गाँव के उन लोगों के घर भिक्षा माँगता हुआ, जो शुद्ध और पवित्र आचरण वाले थे, वह एक ऐसे घर में पहुँचा जहाँ उसने पहले भी भिक्षा ली थी। द्वार पर पहुँचकर ब्राह्मण बोला - 'भिक्षा दो!' भीतर से एक स्त्री बोली - 'ठहरो! (मैं अभी लाती हूँ)'॥ 7-8॥   |   mahabharat अध्याय 3.206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.206.7-8 
मार्कण्डेय उवाच
इत्युक्त्वा बहुशो विद्वान् ग्रामं भैक्ष्याय संश्रित:।
ग्रामे शुचीनि प्रचरन् कुलानि भरतर्षभ॥ ७॥
प्रविष्टस्तत् कुलं यत्र पूर्वं चरितवांस्तु स:।
देहीति याचमानोऽसौ तिष्ठेत्युक्त: स्त्रिया तत:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बार-बार पश्चाताप करके वह विद्वान ब्राह्मण भिक्षा मांगने के लिए गाँव में गया। गाँव के उन लोगों के घर भिक्षा माँगता हुआ, जो शुद्ध और पवित्र आचरण वाले थे, वह एक ऐसे घर में पहुँचा जहाँ उसने पहले भी भिक्षा ली थी। द्वार पर पहुँचकर ब्राह्मण बोला - 'भिक्षा दो!' भीतर से एक स्त्री बोली - 'ठहरो! (मैं अभी लाती हूँ)'॥ 7-8॥
 
Markandeya says - O best of the Bharatas! After repenting again and again in this manner, that learned Brahmin went to the village to beg for alms. Begging alms at the houses of those people of the village who had pure and pious conduct, he reached a house where he had received alms earlier also. Reaching the door, the Brahmin said - 'Give alms!' A woman from inside answered - 'Wait! (I will bring it now)'॥ 7-8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)