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mahabharat 3.206.5-6: उस बगुले को अचेत और निर्जीव पड़ा देखकर ब्राह्मण का हृदय दया से द्रवित हो गया। उसे अपने किए पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने दुःख प्रकट करते हुए कहा- 'हाय! आज क्रोध और मोह के वश होकर मुझसे यह अन्यायपूर्ण कार्य हो गया है।'॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 3.206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  3.206.5-6 
बलाकां पतितां दृष्ट्वा गतसत्त्वामचेतनाम्॥ ५॥
कारुण्यादभिसंतप्त: पर्यशोचत तां द्विज:।
अकार्यं कृतवानस्मि रोषरागबलात्कृत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उस बगुले को अचेत और निर्जीव पड़ा देखकर ब्राह्मण का हृदय दया से द्रवित हो गया। उसे अपने किए पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने दुःख प्रकट करते हुए कहा- 'हाय! आज क्रोध और मोह के वश होकर मुझसे यह अन्यायपूर्ण कार्य हो गया है।'॥5-6॥
 
Seeing that heron lying unconscious and lifeless, the brahmin's heart melted with pity. He felt very remorseful for his misdeed. He expressed grief and said- 'Oh! Today, under the influence of anger and attachment, I have committed this wrongful act.'॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)