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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.206.48 
मार्कण्डेय उवाच
तया विसृष्टो निर्गम्य स्वमेव भवनं ययौ।
विनिन्दन् स स्वमात्मानं कौशिको द्विजसत्तम:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं: युधिष्ठिर! उस धर्मपरायण स्त्री से विदा लेकर वह महाब्राह्मण कौशिक अपने आप को धिक्कारता हुआ अपने घर लौट गया।
 
Mārkaṇḍeya says: Yudhishthir! After taking leave from that pious lady, that great Brahmin Kaushik returned to his home cursing his own self.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने षडधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक

दो सौ छठाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०६॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)