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mahabharat 3.206.44-45: मिथिला में एक शिकारी रहता है, जो माता-पिता का भक्त, सत्यवादी और अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला है। वह तुम्हें धर्म का उपदेश देगा। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! तुम अपनी इच्छानुसार वहाँ जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। ॥44-45॥   |   mahabharat अध्याय 3.206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  3.206.44-45 
मातापितृभ्यां शुश्रूषु: सत्यवादी जितेन्द्रिय:॥ ४४॥
मिथिलायां वसेद् व्याध: स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति।
तत्र गच्छस्व भद्रं ते यथाकामं द्विजोत्तम॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
मिथिला में एक शिकारी रहता है, जो माता-पिता का भक्त, सत्यवादी और अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला है। वह तुम्हें धर्म का उपदेश देगा। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! तुम अपनी इच्छानुसार वहाँ जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। ॥44-45॥
 
There lives a hunter in Mithila, who is a devotee of his parents, truthful and has controlled his senses. He will teach you Dharma. O best of Brahmins! You should go there according to your liking. May you be blessed. ॥ 44-45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)