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mahabharat 3.206.31: द्विजश्रेष्ठ! मैं प्रायः पति-सेवा का ही धर्म मानती हूँ। हे ब्राह्मणदेव! इस पति-सेवा का फल प्रत्यक्ष देखिये। 31॥   |   mahabharat अध्याय 3.206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.206.31 
अविशेषेण तस्याहं कुर्यां धर्मं द्विजोत्तम।
शुश्रूषाया: फलं पश्य पत्युर्ब्राह्मण यादृशम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! मैं प्रायः पति-सेवा का ही धर्म मानती हूँ। हे ब्राह्मणदेव! इस पति-सेवा का फल प्रत्यक्ष देखिये। 31॥
 
Dwijshreshtha! I generally follow the religion of serving my husband. Brahmin deity! See firsthand the results of this husband's service. 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)