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mahabharat 3.206.28-29: हे ब्रह्मन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणों के प्रभाव की अनेक कथाएँ सुनने को मिलती हैं। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों का क्रोध और उनकी दया दोनों ही महान हैं। हे निष्पाप ब्रह्मन्! मैंने आपके प्रति जो अन्याय किया है, उसे क्षमा करें॥ 28-29॥   |   mahabharat अध्याय 3.206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  3.206.28-29 
बहुप्रभावा: श्रूयन्ते ब्राह्मणानां महात्मनाम्॥ २८॥
क्रोध: सुविपुलो ब्रह्मन् प्रसादश्च महात्मनाम्।
अस्मिंस्त्वतिक्रमे ब्रह्मन् क्षन्तुमर्हसि मेऽनघ॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! श्रेष्ठ ब्राह्मणों के प्रभाव की अनेक कथाएँ सुनने को मिलती हैं। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों का क्रोध और उनकी दया दोनों ही महान हैं। हे निष्पाप ब्रह्मन्! मैंने आपके प्रति जो अन्याय किया है, उसे क्षमा करें॥ 28-29॥
 
O Brahman! Many stories are heard which tell about the influence of great Brahmins. Both the anger and the kindness of those great Brahmins are great. O sinless Brahman! Please forgive the wrong that I have done to you.॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)