श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 205: पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  3.205.21-22h 
तयोराशां तु सफलां य: करोति स धर्मवित्।
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस्य नित्यश:॥ २१॥
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्च शाश्वत:।
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! जो पुत्र दोनों की अपेक्षाएँ पूरी करता है, वही धर्म को जानने वाला है। जिस पुत्र के माता-पिता उससे सदैव संतुष्ट रहते हैं, वह इस लोक में तथा परलोक में भी चिरस्थायी यश और सनातन धर्म को प्राप्त करता है।
 
Rajendra! The son who fulfils the expectations of both is the one who knows Dharma. The son whose parents are always satisfied with him, attains everlasting fame and eternal Dharma in this world as well as the next.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)