श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 205: पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.205.16 
मार्कण्डेय उवाच
हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम्।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे॥ १६॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी बोले - भरतश्रेष्ठ ! यद्यपि आपके इस प्रश्न का विश्लेषण करना अत्यन्त कठिन है, फिर भी मैं इसका उचित समाधान करूँगा। आप मेरे मुख से सुनिए ॥16॥
 
Markandeyaji said – Bharatshrestha! Although it is very difficult to analyze this question of yours, still I will solve it properly. You listen from my mouth. 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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