इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णो: समनुकीर्तनम्॥ ४४॥
शृणुयाद् य: स धर्मात्मा पुत्रवांश्च भवेन्नर:।
आयुष्मान् भूतिमांश्चैव श्रुत्वा भवति पर्वसु।
न च व्याधिभयं किंचित् प्राप्नोति विगतज्वर:॥ ४५॥
अनुवाद
जो मनुष्य भगवान विष्णु की स्तुति रूपी इस पावन कथा को सुनता है, वह पुण्यवान और पुत्रवान होता है। जो मनुष्य त्योहारों पर इस कथा को सुनता है, उसे दीर्घायु और समृद्धि की प्राप्ति होती है। उसे रोग आदि का भय नहीं रहता। उसकी सभी चिंताएँ दूर हो जाती हैं।
The person who listens to this holy story in the form of Lord Vishnu's praise becomes virtuous and blessed with a son. The person who listens to this story on festivals gets a long life and prosperity. He has no fear of diseases etc. All his worries go away.
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने चतुरधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक
दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥