श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 204: धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  3.204.28-29 
तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम॥ २८॥
तं प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम्।
आससाद महातेजा: कुवलाश्वो महीपति:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! जब समस्त राजकुमार धुँआधार क्रोध की अग्नि से जल उठे, तब दूसरे कुम्भकर्ण के समान जागृत हुए महाबली राजा कुवलाश्व ने उस महादैत्य पर आक्रमण किया॥28-29॥
 
Bharatshrestha! When all the princes were burnt with the fire of smoky anger, then the great King Kuvalashva, who had awakened like the second Kumbhakarna*, attacked that great demon. 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)