श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 204: धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  3.204.27-28h 
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तयन्निव।
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिल: प्रभु:॥ २७॥
सगरस्यात्मजान् क्रुद्धस्तदद्‍भुतमिवाभवत्।
 
 
अनुवाद
हे राजन! जैसे पूर्वकाल में भगवान कपिल ने क्रोध में आकर राजा सगर के समस्त पुत्रों को क्षण भर में भस्म कर दिया था, उसी प्रकार धुंधु ने क्रोध में भरकर मानो समस्त लोकों का नाश करने की इच्छा से अपने मुख से अग्नि उत्पन्न करके कुवलाश्व के पुत्रों को भस्म कर दिया। यह बड़ी अद्भुत घटना थी॥27 1/2॥
 
O great king! Just as in the past Lord Kapila in anger had burnt all the sons of King Sagara to ashes in a moment, similarly Dhundhu filled with anger, as if he wanted to destroy all the worlds, produced fire from his mouth and burnt the sons of Kuvalashva. This was a wonderful incident.॥27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)