श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 204: धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.204.15 
दिव्यैश्च पुष्पैस्तं देवा: समन्तात् पर्यवारयन्।
देवदुन्दुभयश्चापि नेदु: स्वयमनीरिता:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
देवतागण उन पर सब ओर से दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। देवताओं के नगाड़े बिना किसी प्रेरणा के ही बजने लगे ॥15॥
 
The gods started showering divine flowers on them from all sides. The drums of the gods started playing on their own without any inspiration. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)