श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 202: उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  3.202.17-18 
बहुयोजनविस्तीर्णो बहुयोजनमायत:।
तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रम:॥ १७॥
मधुकैटभयो: पुत्रो धुन्धुर्नाम सुदारुण:।
अन्तर्भूमिगतो राजन् वसत्यमितविक्रम:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उसकी लम्बाई-चौड़ाई अनेक योजन है। वहाँ एक महाबली और पराक्रमी राक्षसराज रहता है। वह मधु और कैटभ का पुत्र है। वह क्रूर स्वभाव वाला राक्षस धुंधु नाम से प्रसिद्ध है। हे राजन! वह महाबलशाली राक्षस पृथ्वी के भीतर छिपा रहता है॥ 17-18॥
 
Its length and breadth are several yojanas. A fierce demon king endowed with great strength and valour lives there. He is the son of Madhu and Kaitabha. That cruel-natured demon is famous by the name of Dhundhu. O King! That immensely powerful demon lives hidden inside the earth.॥ 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)