श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.201.8 
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो मार्कण्डेयो महामुनि:।
धौन्धुमारमुपाख्यानं कथयामास भारत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी ने कहा- भारत! धर्मराज युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर महर्षि मार्कण्डेय ने धुन्धुमार की कथा प्रारम्भ की। 8॥
 
Vaishampayanji said- India! On this saying of Dharamraj Yudhishthira, great sage Markandeya started the story of Dhundhumar. 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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