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श्लोक 3.201.34  |
स योगबलमास्थाय मामकं पार्थिवोत्तम:।
शासनात् तव विप्रर्षे धुन्धुमारो भविष्यति।
एवमुक्त्वा तु तं विप्रं विष्णुरन्तरधीयत॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| ब्रह्मर्षे! आपकी आज्ञा से वे परम कुवलाश्व मेरे योगबल का आश्रय लेकर दैत्य धुंधु का वध करेंगे और संसार में धुंधुमार नाम से विख्यात होंगे। उत्तंक से ऐसा कहकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए॥34॥ |
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| Brahmarshe! By your order, that supreme Kuvalashva will kill the demon Dhundhu by taking shelter of my power of yoga and will become famous in the world by the name of Dhundhumar. Saying this to Uttanka, Lord Vishnu disappeared. 34॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने एकाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक
दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०१॥ |
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