मार्कण्डेय उवाच
एवं स छन्द्यमानस्तु वरेण हरिणा तदा॥ २७॥
उत्तङ्क: प्राञ्जलिर्वव्रे वरं भरतसत्तम।
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा वर माँगने के लिए कहे जाने पर उत्तंक ने हाथ जोड़कर इस प्रकार वर माँगा ॥27 1/2॥
Markandeyaji says- Bharatshrestha! Thus, when requested by Lord Vishnu to seek a boon, Uttanka folded his hands and asked for the boon in this manner. 27 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)