श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  3.201.26-27h 
विष्णुरुवाच
प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या तव च सत्तम॥ २६॥
अवश्यं हि त्वया ब्रह्मन् मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज।
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु ने कहा - सज्जन! मैं तुम्हारे लोभरहित और उत्तम भक्ति के कारण तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। ब्रह्मन्! तुम मुझसे अवश्य वर ग्रहण करो। 26 1/2॥
 
Lord Vishnu said – Gentleman! I am very pleased with you due to your lack of greed and excellent devotion. Brahman! You must definitely take a groom from me. 26 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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