श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  3.201.25-26h 
उत्तङ्क उवाच
पर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान् हरिम्॥ २५॥
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगत: प्रभुम्।
 
 
अनुवाद
उत्तंक बोले - प्रभु ! सम्पूर्ण जगत् की रचना करने वाले दिव्य सनातन पुरुष, सर्वशक्तिमान श्री हरिक, जिनके दर्शन मुझे हुए, वे मेरे लिए सबसे बड़े वर हैं ॥25 1/2॥
 
Uttanka said – Lord! The divine eternal man who created the entire world, the almighty Sri Harika, whom I got the darshan of, is the greatest boon for me. 25 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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