श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान‍्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना  »  श्लोक 15-17
 
 
श्लोक  3.201.15-17 
ब्रह्म वेदाश्च वेद्यं च त्वया सृष्टं महाद्युते।
शिरस्ते गगनं देव नेत्रे शशिदिवाकरौ॥ १५॥
नि:श्वास: पवनश्चापि तेजोऽग्निश्च तवाच्युत।
बाहवस्ते दिश: सर्वा: कुक्षिश्चापि महार्णव:॥ १६॥
ऊरू ते पर्वता देव खं नाभिर्मधुसूदन।
पादौ ते पृथिवी देवी रोमाण्योषधयस्तथा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे महान् एवं तेजस्वी प्रभु! ब्रह्मा, वेद और समस्त जानने योग्य वस्तुओं की रचना आपने ही की है। हे देव! आकाश आपका मस्तक है। चन्द्रमा और सूर्य आपके नेत्र हैं। वायु आपकी श्वास है और अग्नि आपका तेज है। हे अच्युत! समस्त दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं और समुद्र आपका उदर है। हे देव! मधुसूदन! पर्वत आपकी जंघाएँ हैं और अंतरिक्ष आपकी नाभि है। पृथ्वी आपके चरण हैं और औषधियाँ आपके केश हैं।॥15-17॥
 
O great and illustrious Lord! You have created Brahma, the Vedas and all the things worth knowing. O deity! The sky is your head. The moon and the sun are your eyes. The wind is your breath and the fire is your brilliance. O Achyuta! All the directions are your arms and the ocean is your stomach. O deity! Madhusudan! The mountains are your thighs and the space is your navel. The earth is your feet and the medicines are your hair.॥15-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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