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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना
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श्लोक 11
श्लोक
3.201.11
महर्षिर्विश्रुतस्तात उत्तङ्क इति भारत।
मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव॥ ११॥
अनुवाद
भरतनन्दन! कुरुकुल रत्न! महर्षि उत्तंक का नाम बहुत प्रसिद्ध है। हे प्रिय! उनका आश्रम मरु के सुन्दर प्रदेश में है। 11.
Bharatanandan! The name of the Kurukula Ratna! Maharishi Uttanka is very famous. O dear! His hermitage is in the beautiful region of Maru. 11.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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