| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 99 |
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| | | | श्लोक 3.200.99  | ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक् कर्मबुद्धिभि:।
ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम्॥ ९९॥ | | | | | | अनुवाद | | जो मन, वाणी, कर्म और बुद्धि से कोई पाप नहीं करते, वे महान तपस्वी हैं। शरीर को सुखा देना तप नहीं है॥99॥ | | | | Those who do not commit any sins through their mind, speech, actions and intellect are great ascetics. Drying up the body is not penance.॥ 99॥ | | ✨ ai-generated | | |
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