Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.200.96-97: त्रिशूल धारण करना, मौन रहना, सिर पर जटाओं का बोझ रखना, सिर मुँड़ाना, शरीर को ऊन और मृगचर्म से लपेटे रखना, व्रत रखना, स्नान करना, अग्निहोत्र करना, वन में रहना और शरीर को सुखाना - ये सब भाव शुद्ध न होने पर व्यर्थ हैं ॥96-97॥ | mahabharat अध्याय 3.200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
त्रिशूल धारण करना, मौन रहना, सिर पर जटाओं का बोझ रखना, सिर मुँड़ाना, शरीर को ऊन और मृगचर्म से लपेटे रखना, व्रत रखना, स्नान करना, अग्निहोत्र करना, वन में रहना और शरीर को सुखाना - ये सब भाव शुद्ध न होने पर व्यर्थ हैं ॥96-97॥
Wearing the trident, remaining silent, carrying the burden of matted hair on the head, shaving the head, keeping the body wrapped in wool and deer skin, observing fast, taking bath, performing Agnihotra, living in the forest and drying the body - all these are useless if the feelings are not pure. 96-97॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥