| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन » श्लोक 95 |
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| | | | श्लोक 3.200.95  | साधुसङ्गमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा।
पवित्रीकृतमात्मानं सन्तो मन्यन्ति नित्यश:॥ ९५॥ | | | | | | अनुवाद | | सत्संग से पवित्र और सुन्दर वाणी के जल से अभिषिक्त महापुरुष अपने को सदैव पवित्र मानते हैं ॥95॥ | | | | The great men, purified by satsang and anointed by the water of beautiful speech, always consider themselves pure. 95॥ | | ✨ ai-generated | | |
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