श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  3.200.93 
रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम्।
अभिगम्याभिपूज्याथ सद्य: पापात् प्रमुच्यते॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
प्रजा की रक्षा करने वाले राजा और तपस्वी ब्राह्मण के पास जाकर उनकी सेवा और पूजा करने से मनुष्य तुरन्त ही सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥93॥
 
By going to a king who protects his subjects and to an ascetic Brahmin and serving and worshipping them, a man is instantly freed from all sins. ॥93॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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